बाजार

बाजार

बाजार से तात्पर्य किसी स्थान विशेष से नहीं होता है जहां वस्तुएं खरीदी तथा बेची जाती हैं वरन उस समस्त क्षेत्र से होता है जिसमें क्रेता और विक्रेता के बीच ऐसी स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा हो की किसी वस्तु का मूल्य सहज ही समान होने की प्रवृत्ति रखता हो बाजार कहलाता है।

बाजार का महत्व

1. बाजार क्रेता – विक्रेता दोनों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

2. बाजार उत्पादन एवं उपयोगी के मध्य कड़ी का कार्य करता है।

3. बाजार मांग का सृजन करता है।

4. बाजार किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को उन्नत करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम होता है।

5. बाजार आंतरिक एवं बाह्य संस्कृति को बढ़ावा देता है।

बाजार का वर्गीकरण

बाजार निम्न आधारों पर किए जा सकते हैं।

1. क्षेत्र के आधार पर।

2. समय के आधार पर।

3. विक्रय के आधार पर।

4. बिक्री की मात्रा के आधार पर।

5. प्रतियोगिता के आधार पर।

6. वैधानिक के आधार पर।

बाजार का विस्तार

बाजार विस्तार का तात्पर्य बाजार कि पहुंच से है। अर्थात किसी वस्तु या सेवा का बाजार किस सीमा क्षेत्र तक पहुंच पाता है यदि वस्तु की मांग एक सीमित क्षेत्र तक है। तो वह संकीर्ण बाजार होगा जबकि अंतरराष्ट्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर तक फैला हुआ बाजार विस्तृत बाजार होगा।

बाजार विस्तार को प्रभावित करने वाले तत्व

1. वस्तु के गुण-: वस्तु के गुण बाजार विस्तार को अपने कई विशेषताओं से प्रभावित करते है। वस्तु की बनावट, मांग, उपलब्धता, टिकाऊ, प्रचार-प्रसार आदि वस्तु के लिए बाजार विस्तार को प्रभावित करते हैं।

2. राष्ट्र की आंतरिक दशाएं-: व्यापार एवं बाजार के लिए उपलब्ध आंतरिक दशाए बाजार विस्तार को प्रभावित करती हैं कानून व्यवस्था की स्थिति, संरचनात्मक एवं वित्तीय सुविधाओं की उपलब्धता, सरकार की नीति आदि से बाजार विस्तार प्रभावित होता है।

वस्तु का मूल्य निर्धारण

मूल्य निर्धारण एक जटिल प्रक्रिया है किसी वस्तु का मूल्य कितना हो यह तय करना कठिन होता है क्योंकि यह कई कारकों पर निर्भर करता है इन कारकों के संबंध में अर्थशास्त्रियों के बीच सहमति नहीं है एडम स्मिथ तथा रिकॉर्डो ने जहां उत्पादन व्यय को मूल्य – निर्धारण का मुख्य कारक बताया। वही जेवेन्स तथा वालरस ने सीमांत उपयोगिता को मुख्य मूल्य – निर्धारक बताया। सामान्य तौर पर उत्पादन व्यय, अर्थात उत्पादन लागत तथा मांग एवं पूर्ति वस्तुओं के मूल्य निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाते हैं।

वस्तु के मूल्य निर्धारण में निम्न दो शक्तियां भूमिका निभाती हैं

1. मांग शक्ति-: जब वस्तु में निहित उपयोगिता को प्राप्त करने के लिए कोई व्यक्ति विक्रेता से उस वस्तु की मूल्य सहित मांग करता है तो वहां मांग शक्ति प्रभावित होती है यहां वस्तु का अधिकतम मूल्य उस वस्तु की सीमांत उपयोगिता द्वारा निर्धारित होगा जिसकी उपयोगिता जितनी अधिक होगी उसका मूल्य उतना ही अधिक होगा।

2. पूर्ति शक्ति-: उत्पादन, लागत तथा मांग के अतिरिक्त पूर्ति भी मूल्य निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाती है। उत्पादन तथा विक्रेता वस्तु की पूर्ति करके लाभ प्राप्त करते हैं लेकिन यदि मांग के अनुरूप पूर्ति नहीं होती है तो उपभोक्ता अधिक मूल्य देकर वस्तु को प्राप्त करना चाहता है इस तरह विक्रेता कम पूर्ति की स्थिति में अधिक मूल्य कर देता है।

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