उत्पादन का उसके संसाधनों में वितरण

उत्पादन-: उत्पादन वह प्रक्रिया है जिससे वस्तुओं में उपयोगिता का सृजन होता है।

भूमि-: जमीन या पृथ्वी की ऊपरी सतह जिस पर हम चलते फिरते रहते हैं उसे भूमि कहा जाता है अर्थशास्त्र में भूमि से अभिप्राय उन समस्त प्राकृतिक संसाधनों से है जो प्रकृति की ओर से मनुष्य को पृथ्वी तल पर उसके नीचे तथा उसके ऊपर निशुल्क प्राप्त होते हैं।

भूमि की विशेषताएं या लक्षण

1. भूमि प्रकृति का  निशुल्क उपहार-: भूमि मनुष्य को प्रकृति से निशुल्क उपहार के रूप में प्राप्त हुई है। मनुष्य को इसके लिए कोई शुल्क नहीं देना पड़ता है जैसे पानी, वायु, प्रकाश आदि हमें प्रकृति से निशुल्क प्राप्त होते हैं।

2. भूमि स्थायी-: आदिकाल से लेकर वर्तमान काल तक भूमि स्थाई अवस्था में किसी न किसी रूप में विद्वान रही है। प्राकृतिक प्रकोप से जल के स्थान पर स्थल तथा पाहड के स्थान पर समुद्र बन सकते हैं।

3. भूमि उत्पादन का निष्क्रिय साधन-: दूसरे साधनों का उपयोग करके ही भूमि पर उत्पादन कार्य किया जाता है यह संपादन कार्य नहीं करती है जैसे-: श्रम व औजारो द्वारा किसी भूमि से किसी फसल को उत्पादित (उत्पन्न) किया जाता सकता है।

4. भूमि विभिन्न प्रकार-: भूमि भी अनेक प्रकार की होती है जैसे-: खेती योग्य भूमि, मकान आदि बनाने के लिए भूमि, बंजर भूमि, भूमि की उत्पादकता भी विभिन्न विभिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न होती है। कहीं भूमि अधिक उपजाऊ होती है तथा किसी स्थान पर भूमि कम उपजाऊ होती है।

5. भूमि अक्षय (अमर)-: भूमि पर लंबे समय तक कृषि करने पर उसकी उर्वरा शक्ति कम होने लगती है जिसे समय-समय पर उपयुक्त उपाय करके उपजाऊ बनाया जाता है परंतु इसे नष्ट नहीं किया जा सकता है अर्थात भूमि अक्षय है।

श्रम (परिश्रम या मेहनत)

मनुष्य के सभी प्रकार के शारीरिक या मानसिक प्रयत्न जो किसी प्रतिफल की आशा से किए जाते हैं श्रम कहलाते हैं।

श्रम का वर्गीकरण

श्रम को निम्न भागों में बांट सकते हैं।

1. कुशल और अकुशल श्रम-: जब किसी कार्य को करने के लिए उस कार्य से पहले प्रशिक्षण लिया जाता है तो इस प्रकार का श्रम कुशल श्रम कहलाता है जैसे-: डॉक्टर, इंजीनियर  का श्रम।

2. शारीरिक या मानसिक श्रम-: जब किसी कार्य को करने के लिए शारीरिक श्रम अधिक करना पड़ता है तो इस प्रकार का श्रम शारीरिक श्रम कहलाता है जैसे खेती करने वाले मजदूर, रिक्शा चलाना आदि। जब किसी कार्य को करने के लिए मानसिक प्रयत्न अधिक करना पड़ता है तो वह मानसिक श्रम कहलाता है जैसे-: शिक्षक का श्रम, डॉक्टर का श्रम, टेक्नोलॉजी श्रम आदि।

श्रम के लक्षण या विशेषताएं

1. श्रम नाशवान-: यदि कोई विश्राम किसी दिन कार्य नहीं करता है तो उस दिन का उसका श्रम समाप्त हो जाता है अतः श्रम नाशवान है।

2. श्रमिक केवल अपना श्रम बेचना-: श्रमिक अपने श्रम योग्यता और शरीर का स्वयं मालिक होता है वह केवल अपना  श्रम बेचता है उसकी व्यक्तिगत तथा गुणों पर क्रेता का कोई अधिकार नहीं होता है।

3. श्रमिकों को श्रमिक से पृथक नहीं किया जा सकता-: जब कोई श्रमिक किसी प्रकार का कार्य करता है तो वह कार्य करने के लिए स्वयं कार्य स्थल पर उपस्थित होता है अत श्रम को श्रमिक से पृथक नहीं किया जा सकता है।

4. श्रमिक को अपनी बुद्धि तथा निर्णय शक्ति का प्रयोग करना-: आधुनिक युग में मशीनों पर कार्य करना और उन पर नियंत्रण तथा अपनी सुरक्षा करना आदि में मस्तिष्क का प्रयोग होता है अतः श्रमिक अपनी बुद्धि तथा निर्णय शक्ति का प्रयोग करता है।

श्रम का महत्व

1. आर्थिक विकास में महत्व-: प्राकृतिक संसाधन और मानवीय संसाधन किसी देश के आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। मानवीय संसाधन द्वारा ही प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जाता है जैसे-: किसी देश में लोहे खनिज की अधिकता है तब वहां लौह खनिज से संबंधित उद्योग विकसित होंगे जिसके लिए मानवीय श्रम की आवश्यकता होगी।

2. अविष्कार तथा अनुसंधान में महत्व-: नई प्रौद्योगिकी द्वारा नई – नई मशीनों का निर्माण किया जाता है जिसके निर्माण तथा अनुसंधान में प्रशिक्षित श्रमिकों का महत्वपूर्ण योगदान होता है।

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