कार्य, ऊर्जा एवं सामर्थ्य

कार्य, ऊर्जा एवं सामर्थ्य

कार्य

मनुष्य अपने दैनिक जीवन में अनेक कार्य करता है जैसे-: साइकिल चलाना, पुस्तक पढ़ना, मैदान में खेलना, बातचीत करना आदि। साधारण भाषा में इन सभी क्रियाओं को कार्य कहा जाता है परंतु भौतिक विज्ञान के अनुसार  कार्य तब ही किया हुआ माना जाता है जब वस्तु पर बल लगाने से वस्तु में विस्थापन होता है अतः कार्य वह प्रक्रिया है जिसमें किसी वस्तु पर बल लगाकर उसे बल की दिशा में विस्थापित किया जाता है अर्थात वस्तु की स्थिति में परिवर्तन किया जाता है उदाहरण-: किसी सतह पर रखी लकड़ी के गुटके को धकेलना, साइकिल चलाना आदि।

कार्य के प्रकार

कार्य तीन प्रकार का होता है

धनात्मक कार्य-: यदि बल और विस्थापन के मध्य बन रहे कोण का मान 90 डिग्री से कम हो तो किया गया कार्य धनात्मक होगा उदाहरण-: यदि कोई व्यक्ति किसी पिण्ड को पृथ्वी की सतह से ऊपर उठाता है तो उसके द्वारा किया गया कार्य धनात्मक होगा।

ऋणात्मक कार्य-: यदि बल और विस्थापन के मध्य बने कोण का मान 90 डिग्री से अधिक हो तो किया गया कार्य ऋणात्मक होगा।  उदाहरण-: जब किसी वस्तु को खुर्द- अरे धरातल पर खींचा जाता है तो घर्षण बल तथा विस्थापन परस्पर विपरीत दिशा में होते हैं अतः घर्षण बल द्वारा किया गया कार्य ऋणात्मक होगा।

शुन्य कार्य-: जब बल तथा विस्थापन लंबवत दिशा में होते हैं तो बल द्वारा किया गया कार्य शुन्य होगा। उदाहरण-: यदि कोई कुली सिर पर बोझ उठाकर प्लेटफार्म पर चल रहा है तो वह कोई कार्य नहीं करता क्योंकि उसका कार्य गुरुत्व बल के लंबत है। इस प्रकार वृत्ताकार पथ पर घूमते पिंड पर बल की दिशा सदा पिंड की गति के लंबवत होती है अतः वृत्ताकार पथ पर घूमते पिंड पर बल द्वारा किया गया कार्य सदैव शुन्य होता है।

कार्य का मात्रक जूल होता है।

ऊर्जा

किसी वस्तु द्वारा कार्य करने की क्षमता उसकी ऊर्जा कहलाती है किसी वस्तु में निहित ऊर्जा का मापन वस्तु द्वारा किए गए कार्य से करते हैं।

ऊर्जा का मात्रक

कार्य ऊर्जा के स्थानांतरण से होता है अतः जितना कार्य होता है वही ऊर्जा की मां होती है ऊर्जा का भी वह मात्रक होता है जो कि कार्य का है अर्थात ऊर्जा का मात्रक जूल होता है।।

ऊर्जा के प्रकार

ऊर्जा निम्न प्रकार की होती है।

(1) यांत्रिक ऊर्जा-: वह कुरजा जिसके कारण कोई वस्तु यांत्रिक कार्य कर सकती है यांत्रिक ऊर्जा कहलाती है उदाहरण-: गिरता हुआ पत्थर, खींचा हुआ तीर, चाबी भरी हुई घड़ी की स्प्रिंग आदि।

(2) प्रकाश ऊर्जा-: जिस ऊर्जा के कारण हमें वस्त्र स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं प्रकाश ऊर्जा कहलाती है। उदाहरण-: विद्युत बल्ब, मोमबत्ती आदि से प्राप्त ऊर्जा

(3) पवन ऊर्जा-: तेज गति से बहती हुई वायु में गतिज ऊर्जा होती है वायु की यही ऊर्जा पवन ऊर्जा कहलाती है। पवन ऊर्जा का उपयोग पवन चक्कीओं, जल पंप इत्यादि में किया जाता है। वर्तमान में पवन ऊर्जा का उपयोग विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करने में भी करते हैं।

ऊर्जा संरक्षण का नियम

इस नियम के अनुसार उड़ जाना तो उत्पन्न की जा सकती है और ना ही नष्ट की जा सकती है इसे एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित कर सकते हैं अतः संसार की कुल ऊर्जा का परिमाण स्थिर रहता है।

ऊर्जा रूपांतरण

ऊर्जा के एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होने की प्रक्रिया ऊर्जा रूपांतरण कहलाती है।

(1) बिजली के बल्ब का जलना-: इस प्रक्रिया में विद्युत ऊर्जा का रूपांतरण उष्मीय ऊर्जा व प्रकाश ऊर्जा में होता है।

(2) डायनमो से विद्युत उत्पन्न करना-: इस प्रक्रिया में गतिज ऊर्जा का रूपांतरण विद्युत ऊर्जा में होता है यह प्रक्रिया अधिकतर डामो पर उपयोग कि जाती है।

(3) घरों में बिजली के उपकरणों के उपयोग में-: घरों में लगे बिजली के पंखे, फ्रिज, कूलर, एसी इत्यादि में विद्युत ऊर्जा का रूपांतरण गतिज ऊर्जा व उष्मीय ऊर्जा के रूप में होता है।

द्रव्यमान – ऊर्जा समीकरण

आइंस्टीन ने यह सिद्ध किया कि द्रव्यमान तथा ऊर्जा एक दूसरे से संबंधित है अतः प्रत्येक पदार्थ में उसके द्रव्यमान के कारण भी उर्जा हो सकती है आइंस्टीन की द्रव्यमान ऊर्जा समीकरण विश्व विख्यात है। इसके अनुसार

द्रव्यमान को ऊर्जा में तथा उर्जा को द्रव्यमान में परिवर्तित किया जा सकता हैं अर्थात ब्रह्मांड में ऊर्जा तथा द्रव्यमान नियत है।

ब्रह्मांड में जितनी उर्जा उत्पन्न होगी उतना ही द्रव्यमान नष्ट होगा।।।

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