जीवन की प्रक्रियाए

जीवन की प्रक्रियाए

जीवधारियों  की जटिल संरचना के अनुरूप ही उनके जीवित रहने की प्रक्रिया भी अत्यंत जटिल होती है। वास्तविकता में अगर हम सजीव और निर्जीव के बीच में सबसे महत्वपूर्ण मूलभूत अंतर को समझाना चाहे तो यह अंतर इन्हीं प्रक्रिया से संबंधित है अर्थात इन प्रक्रियाओं की ऊर्जा से संविदा एवं सचिवों में उपस्थिति तथा निर्जीव में अनुपस्थिति इनके महत्व को स्वतह ही दर्शाती है कोई भी जटिलतम जैविक संरचना अपने निम्नतम स्तर पर अणुओ की ही बनी होती है।

 दूसरे शब्दों में जीव धारियों में जीवन का चलायमान रहना शरीर की वृद्धि, मरम्मत, अनुरक्षण आदि के लिए विभिन्न अणुओं की ही आवश्यकता होती है साथ ही इन प्रक्रियाओं के संपन्न होने के लिए इन में भाग लेने वाले अणुओं का गतिशील होना भी जरूरी है

 अगर दार्शनिक नजरिए से और भी स्तर पर इन प्रक्रियाओं को देखें तो हमको इनमें सिर्फ और वह का बनना संश्लेषण और उनका टूटना विखंडन ही नजर आएगा अतः हम कह सकते हैं कि सभी जीव धारियों में उनकी आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कुछ संश्लेषणात्मक एवं विखंडनात्मक क्रियाएं सदैव चलती रहती हैं वे सभी प्रक्रिया जो जीव को जीवित बनाए रखने में सक्षम होती हैं उपापचय या जैविक या जीवन प्रक्रिया कहलाती हैं। जैसे-: पोषण, श्वसन, उत्सर्जन, परिवहन आदि।

जीवो में होने वाली समस्त उपापचयी क्रियाओं को निम्नलिखित दो समूहों में बांटा जा सकता है।

(1)उपचयी क्रियाएं-: वे क्रियाए जिनमें सरल कार्बनिक पदार्थों से जटिल कार्बनिक पदार्थों का संश्लेषण होता है उपचायी क्रियाए कहलाती हैं जैसे-: प्रकाश संश्लेषण।

(2) अपचायी क्रियाएं-: वे क्रियाए जिनमें जटिल कार्बनिक पदार्थ, सरल कार्बनिक पदार्थों में विखंडित होते हैं अपचायी क्रियाए कहलाती हैं। जैसे-: श्वसन, पाचन आदि।

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