भारत की मिट्टी का वर्गीकरण ,भारतीय मिट्टी के गुण ,भारतीय मिट्टी का संरक्षण,

भारत की मिट्टी का वर्गीकरण

भारत में पाई जाने वाली मिट्टी को सामान्यतः 6 भागों में बांटा गया है जो निम्न है।

(1) पर्वतीय मिट्टी-: जिस प्रकार विषुवत रेखा से दूर चलने पर ताप और वर्षा की विविधता के कारण अलग-अलग प्रकार की मिट्टी के कटिबंध क्षेत्र मिलते हैं। उसी प्रकार पर्वतों के नीचे से ऊपर जाने पर कई प्रकार की मिट्टियां मिलती हैं। नीचे के भाग पर भूरी मिट्टी और पर्वतीय भाग पर भूरे रंग की मिली- जुली मिट्टी मिलती है। भारत में लगभग दो करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर पर्वतीय मिट्टी का विस्तार है।हिमालय के पर्वतीय भाग में नवीन पथरीली तथा चुना युक्त मिट्टियां पाई जाती हैं। दक्षिणी भाग में कंकड़ पत्थर एवं मोटे कण वाली वायु युक्त मिट्टी तथा देहरादून, नैनीताल और पुणे में चुना युक्त मिट्टी पाई जाती है हिमालय के ऊंचे भाग में आग्नेय चट्टानों से निर्मित मिट्टी पाई जाती है। इस मिट्टी पर चाय की खेती, फलों की खेती और सूखे मेवों की खेती अच्छी होती है। सिंचाई की सुविधा मिलने पर इस मिट्टी में गेहूं, चावल आदि की खेती अच्छी होती है।

(2) जलोढ़ मिट्टी-: यह मिट्टी नदियों द्वारा लाई गई भूमि के संचय से बनी है। यह नवीन और उपजाऊ मिट्टी है। इस मिट्टी का महत्व इसलिए है क्योंकि यह अत्यंत उपजाऊ है।  यह भारत के 7.7 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में फैली है।

भारत के विशाल उत्तरी मैदान में नदियों द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों में बहा कर लाई गई जीवाश्म युक्त उर्वरक मिट्टी मिलती है।जिसे कछारी मिट्टी कहते हैं। यह मिट्टी देश के 40% भूभाग पर पाई जाती है। इस मिट्टी के निर्माण में गंगा, यमुना और सतलज नदियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जलोढ़ मिट्टी पूर्वी तटीय मैदानों विशेष रूप से महानदी, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी नदी के डेल्टाई प्रदेशों में सामान्य रूप से मिलती है। बाढ़ के समय नदियों के किनारे नवीन जलोढ़ मिट्टी का विस्तार अधिक हो जाता है।

भारत की 50% जनसंख्या के लिए कृषि कार्य द्वारा भोजन इसी मिट्टी पर उत्पन्न किया जाता है। इसमें गेहूं, चावल तिलहन, तंबाकू की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

(3) मरुस्थलीय मिट्टी-: मरुस्थलीय मिट्टी थार के मरुस्थल और उसके निकटवर्ती शुष्क प्रदेशों में पाई जाती है। इस मिट्टी के कण बड़े होते हैं। इसी मिट्टी को स्थानीय भाषा मे थूर, ऊसर आदि नामों से पुकारा जाता है। इस मिट्टी में लवण युक्त तत्वों की मात्रा ज्यादा पाई जाती है। इस मिट्टी में जल ग्रहण करने की क्षमता नहीं होती है। इस मिट्टी में जीवाश्म का भी अभाव रहता है। इस मिट्टी का विस्तार 114 लाख हेक्टेयर पर है। इस मिट्टी के कण संगठित नहीं होते जिससे वायु इसको एक स्थान से दूसरे स्थान पर उड़ाकर आसानी से ले जाती है। इस मिट्टी में वायु और आकाश का प्रवेश भी आसानी से हो जाता है। इस मिट्टी में उपजाऊ क्षमता कम होती है। परंतु सिंचाई द्वारा इन मिट्टियों में ज्वार बाजरा मूंगफली तथा उड़द आदि फसलों की खेती की जाती है। इस मिट्टी का विस्तार पश्चिमी राजस्थान, गुजरात, दक्षिणी पंजाब तथा दक्षिणी पश्चिमी हरियाणा में पाया जाता है।

(4) काली मिट्टी-:इस मिट्टी का निर्माण लवण युक्त पदार्थों से हुआ है। प्राचीन काल में दक्षिण के पठार ज्वालामुखी के उदगार से लावा बहकर धरातल के ऊपर फैल गया। और ठंडा होकर ठोस रूप में जम गया। जो आज काली मिट्टी के रूप में स्पष्ट हो गया है। इस मिट्टी को काली मिट्टी या रंगून मिट्टी भी कहते हैं‌। इस मिट्टी में नमी धारण करने की क्षमता अधिक होती है। इसमें लोहा, फास्फोरस, चूना, मैग्नीशियम, एलुमिनियम आदि तत्वों की अधिक मात्रा पाई जाती है। इस मिट्टी का विस्तार लावा पठार के अलावा अन्य जगहों पर भी है।

(5) लाल मिट्टी-: इस मिट्टी का रंग लाल इसलिए होता है क्योंकि गर्मी के दिनों में कैपिलर छिद्र द्वारा मिट्टी लोहे का जंग उतर आता है। जमने की से यह लगता है कि इस मिट्टी का निर्माण शैलो के टूटने से हुआ होगा। जिन जिन्हें लोहे का अंश अधिक मात्रा में पाया जाता है। छोटा नागपुर का पठार, ओडिशा, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक तक दक्षिण पूर्वी महाराष्ट्र राज्य में इस प्रकार की मिट्टी पाई जाती है। इस मिट्टी में फास्फोरस तथा वनस्पति के सड़े- गले का अभाव होता है। इसीलिए यह मिट्टी उपजाऊ प्रकार की मिट्टी है। इस मिट्टी मे ज्वार बाजरा इस मिट्टी में ज्वार बाजरा की खेती होती है।

(6) लैटेराइट मिट्टी-: लेटराइट मिट्टी का रंग लाल और हल्का पीला होता है। यह मिट्टी बड़े कण वाली होती है। इस मिट्टी में कंकड़ पत्थर के टुकड़े अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।यह मिट्टी उपजाऊ होती है। इसीलिए लैटेराइट मिट्टी के प्रदेशों की संख्या और वनस्पति का अभाव रहता है। जो कि पौधों का मुख्य भोजन है।

इस मिट्टी में एलुमिनियम, आयरन ऑक्साइड ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं। मध्य प्रदेश के पूर्वी घाट, मालावार तट, महाराष्ट्र और असम में यह मिट्टी पाई जाती है। जुताई एवं खाद का इस्तेमाल करके इसमें ज्वार, बाजरा, गेहूं, दलहन की खेती कि जाती है। यह मिट्टी भारत के आठ लाख(800000) वर्ग किमी क्षेत्र पर फैली है।

भारतीय मिट्टी के गुण

भारत में पाई जाने वाली मिट्टियों में निम्न में गुण पाए जाते हैं।

1. भारत में पाई जाने वाली पर्वतीय मिट्टी भूरे रंग की मिश्रित उर्वरक मिट्टी होती है जिसमें चावल की खेती होती है।

2. भारत में पाई जाने वाली मिट्टी जलोढ़ मिट्टी में पोटाश, चुना, फास्फोरस की मात्रा अधिक पाई जाती है। अपनी उर्वरा शक्ति के लिए यह विश्व प्रसिद्ध है। भारत की 50% जनसंख्या का भरण पोषण इसी मिट्टी पर उत्पन्न फसलों से होता है।

3. भारत में पाई जाने वाली काली मिट्टी का निर्माण ज्वालामुखी उद्गार से निकलने वाला लावा से हुआ है। इसलिए यह मिट्टी उपजाऊ है।

4. भारत में पाई जाने वाली मरुस्थलीय मिट्टी में क्षारिय गुण पाया जाता है। इसमें सोडियम, कैल्शियम की मात्रा ज्यादा पाई जाती है। इसमें ज्वार, बाजरा ,मूंगफली की खेती होती है।

5. भारत में लगातार खेती करने से उसकी मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है।

6. भारत में ज्यादातर समय ऊंचा तापमान का पाया जाता है। जिससे मिट्टियों का भौतिक और रासायनिक विघटन होता रहता है।

           भारतीय मिट्टी का संरक्षण

1. भारत की उर्वरा शक्ति में वृद्धि के लिए रासायनिक खादों की अपेक्षा जैविक खादों का इस्तेमाल करना चाहिए।

2. खेतों से जल निकास की उचित सुविधा होनी चाहिए।

3. नालियों और गड्ढों को समतल करना चाहिए।

4. खेतों में हरी खाद वाली फसलों को होना चाहिए।

5. ढालों के विपरीत जुदाई करके मिट्टी की उर्वरा शक्ति को कायम रखना चाहिए।

6. खेतों में प्रतिवर्ष फसलों को बदल- बदल कर उगाना चाहिए जिससे खेतों की उर्वरा शक्ति बनी रहे।

भारत में मिट्टी के अपरदन और मिट्टी के स्थाई संरक्षण के लिए सन 1953 में केंद्र संरक्षण बोर्ड की स्थापना की गई इसके मुख्य रूप से तीन उद्देश्य थे

1. कटाव युक्त भूमि को कृषि योग्य भूमि में बदलना।

2. मरुस्थल के विस्तार पर नियंत्रण  लगाना।

3. वर्तमान किसी कृषि योग्य भूमि की उर्वरा शक्ति में किसी भी प्रकार की कमी नहीं आनी चाहिए इससे उद्देश्य की पूर्ति के लिए जयपुर, जोधपुर, देहरादून व कोटा (राजस्थान) में अनेक  अनुसंधानसालाऐ स्थापित की गई है।

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